सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्यार का ये सफर Pyar Ka Ye Safar

प्यार का ये सफर 



प्यार का ये सफर तेरे साथ है सुहाना,
तेरे बिना ये रास्ता है वीराना।
तू ही है मेरी मंजिल, तू ही है मेरा जहाँ,
तेरे बिना सब लगता है बेजान।

तेरे संग हर दिन है एक नई शुरुआत,
तेरे बिना जैसे रुक गई हो हर बात।
तू हो तो ज़िन्दगी लगे एक हसीन ख्वाब,
तेरे बिना ये दिल है जैसे कोई बिखरा राज़।

तेरी मौजूदगी से मिलती है रौशनी हर ओर,
तेरे बिना ये दिल है बस एक खाली कोर।
तू हो तो दुनिया लगती है रंगीन,
तेरे बिना हर खुशी है जैसे कहीं दूर बीन।

तेरे बिना रास्ते लगते हैं अजनबी,
तू साथ हो तो हर सफर लगे हसीन कभी।
तू ही है मेरे दिल की सबसे बड़ी आस,
तेरे बिना हर मंजिल लगे बिल्कुल पास।

अब हर सफर में बस तेरा साथ चाहिए,
तेरे बिना कोई और नहीं चाहिए।
तू ही है मेरी ज़िन्दगी का पूरा सार,
तेरे बिना सब लगे जैसे कोई बेकार।


This poem expresses the beauty of love when shared with a beloved, portraying how every journey becomes delightful in their presence, while their absence leaves life feeling empty and lifeless.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ कमीने दोस्त Kuch Kamine Dost

 कुछ कमीने दोस्त कभी हंसते हैं, कभी रुलाते हैं,  कुछ क़ामिन दोस्त हमें यूं ही सताते हैं।  हंसी में छुपा एक राज़ है, जो  हर मस्ती में अपनी बात बताते हैं।  जब भी मुश्किलें आईं, साथ खड़े रहे,  फिर भी कभी-कभी दिल से हमें तंग करते रहे।  उनकी दोस्ती का ये अनोखा अंदाज़ है,  कभी प्यार से, कभी मजाक में हमें नचाते हैं।  कभी पास आते, कभी दूर हो जाते,  पर ये दोस्ती में कभी कमी नहीं लाते।  कुछ क़ामिन दोस्त हैं, पर दिल के करीब हैं,  उनके साथ बिताए लम्हे, हमेशा खास रहते हैं। -: नितिन कुमार :-

देश की मिट्टी (Desh ki Mitti) - Soil of the Nation

देश की मिट्टी (Desh ki Mitti) - Soil of the Nation पहला छंद: देश की मिट्टी, चंदन सी पावन, माथे पे लगाऊँ, बन जाऊँ मैं धावन। इसकी रक्षा में, जीवन अर्पण कर दूँ, भारत माँ की सेवा में, हर पल समर्पित रहूँ। दूसरा छंद: इस मिट्टी में जन्मे, वीर सपूत अनेक, जिनकी गाथा गाता, हर एक जन सेवक। भगत सिंह, गाँधी, नेहरू की यह धरती, त्याग और बलिदान की, अमर कहानी गढ़ती। तीसरा छंद: इस मिट्टी में खिले, रंग-बिरंगे फूल, भाईचारा, एकता का, अनुपम है मूल। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब यहाँ, मिलजुल कर रहते, जैसे एक परिवार महान। चौथा छंद: देश की मिट्टी, मेरी माँ का आँचल, इसकी रक्षा में, मैं हूँ अटल। हर कण में बसा, देशप्रेम का भाव, भारत माँ की जय, यही मेरा है ठाव।

मन उंच उंच उडे आकाशी - Man Unch Unch Ude Aakashi

मन उंच उडे आकाशी मन उंच उडे आकाशी बोट लावुनिये नभाशी मी आहे अजुनी धर्तीवर मना तू आता काहीतरी कर. बघ इथे फक्त स्वप्नांची नगरी राख होते सकाळी सगळी उजे ड  इथे इमारतीतच येतो गरीब इथे रोजच मरतो. फुलांचा इथे गंध नसतो मातीलाही इथे रंग नसतो मोलभाव होतो इथे इमानाचा खून होतो इथे नात्याचा जा कुठेतरी उडत जा जिथे असेल माणुसकी नात्या पलिकडचे नाते असेल असेल तिथे जाणीवकी -: नितिन कुमार :-