सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सोचा के अब चल दूँ - Socha Ke Ab Chal Dun

सोचा के अब चल दूँ।





खाली हाथ थे न कोई काम था,
दिल में जुनून और जज्बा था।
उमंग भी थी भरी-भरी,
आखों में भी एक ख्वाब था।

आंधियां भी चल पड़ी थी,
राहें भी अब धुंधलाई थी।
आँखों में आग थी और
सोचा के अब चल दूँ।

अरमानों के  बवंडर में
खुदको तलाश रहा था ।
किस्मत की अनचाही
लकीरें छाँट रहा था।

ना मंजिल का पता था
ना कोई मक़ाम था।
बस खुद में हौसला भरके,
सोचा के अब चल दूँ।

अब लहरें भी पर्वतों से टकरा रही थी,
अब साहिल भी आसमां छुं रहा था।
खामोशियाँ भी अब बरस रही थी,
दिलमें एक एहसास चुभ रहा था।

मैं अकेला किनारों पे बेजारसा,
दस्तक दे रहा था।
कश्ती भी अब हिचकोले खा रही थी,
तभी सोचा के अब चल दूँ।


ना बवंडर था, ना आंधियाँ
अब सबकुछ शांत था।
अब सिर्फ खुला आसमान और समंदर
मुझे पुकार रहा था।


.... और मैं अब चल दिया।

-: नितिन कुमार :-

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ कमीने दोस्त Kuch Kamine Dost

 कुछ कमीने दोस्त कभी हंसते हैं, कभी रुलाते हैं,  कुछ क़ामिन दोस्त हमें यूं ही सताते हैं।  हंसी में छुपा एक राज़ है, जो  हर मस्ती में अपनी बात बताते हैं।  जब भी मुश्किलें आईं, साथ खड़े रहे,  फिर भी कभी-कभी दिल से हमें तंग करते रहे।  उनकी दोस्ती का ये अनोखा अंदाज़ है,  कभी प्यार से, कभी मजाक में हमें नचाते हैं।  कभी पास आते, कभी दूर हो जाते,  पर ये दोस्ती में कभी कमी नहीं लाते।  कुछ क़ामिन दोस्त हैं, पर दिल के करीब हैं,  उनके साथ बिताए लम्हे, हमेशा खास रहते हैं। -: नितिन कुमार :-

देश की मिट्टी (Desh ki Mitti) - Soil of the Nation

देश की मिट्टी (Desh ki Mitti) - Soil of the Nation पहला छंद: देश की मिट्टी, चंदन सी पावन, माथे पे लगाऊँ, बन जाऊँ मैं धावन। इसकी रक्षा में, जीवन अर्पण कर दूँ, भारत माँ की सेवा में, हर पल समर्पित रहूँ। दूसरा छंद: इस मिट्टी में जन्मे, वीर सपूत अनेक, जिनकी गाथा गाता, हर एक जन सेवक। भगत सिंह, गाँधी, नेहरू की यह धरती, त्याग और बलिदान की, अमर कहानी गढ़ती। तीसरा छंद: इस मिट्टी में खिले, रंग-बिरंगे फूल, भाईचारा, एकता का, अनुपम है मूल। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब यहाँ, मिलजुल कर रहते, जैसे एक परिवार महान। चौथा छंद: देश की मिट्टी, मेरी माँ का आँचल, इसकी रक्षा में, मैं हूँ अटल। हर कण में बसा, देशप्रेम का भाव, भारत माँ की जय, यही मेरा है ठाव।

मन उंच उंच उडे आकाशी - Man Unch Unch Ude Aakashi

मन उंच उडे आकाशी मन उंच उडे आकाशी बोट लावुनिये नभाशी मी आहे अजुनी धर्तीवर मना तू आता काहीतरी कर. बघ इथे फक्त स्वप्नांची नगरी राख होते सकाळी सगळी उजे ड  इथे इमारतीतच येतो गरीब इथे रोजच मरतो. फुलांचा इथे गंध नसतो मातीलाही इथे रंग नसतो मोलभाव होतो इथे इमानाचा खून होतो इथे नात्याचा जा कुठेतरी उडत जा जिथे असेल माणुसकी नात्या पलिकडचे नाते असेल असेल तिथे जाणीवकी -: नितिन कुमार :-