सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कळत नकळत - Kalat Nakalat

कळत नकळत




केव्हातरी ती मनाच्या मार्गाने
कळत नकळत हृदयात आली
आठवणीच्या फुलांचा सुवास
लेवुनिच ती इथे आली



ती जेव्हा समोर येते
जाणीवा मनात दाटतात
कळत नकळत मग
भावना स्पर्श करून जातात


अश्याच एका सांझवेळी
तिची नि माझी नजरभेट झाली
आणि कळत नकळत अशीच
प्रीत लागून गेली

 
 
केव्हातरी पाहत होइल
एकदा अंधारातून उजेडात जाईल
आणि तिची पाठमोरी आकृती
कळत नकळतच मनाला वेड लावून जाईल
 
 
 
नाजुकशी अशी वळने घेत
लटा तिच्या कमरे एवढी झाली
फक्त एक रातरानि तिच्या केशात
कळत नकळतच मला आवडून गेली

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ कमीने दोस्त Kuch Kamine Dost

 कुछ कमीने दोस्त कभी हंसते हैं, कभी रुलाते हैं,  कुछ क़ामिन दोस्त हमें यूं ही सताते हैं।  हंसी में छुपा एक राज़ है, जो  हर मस्ती में अपनी बात बताते हैं।  जब भी मुश्किलें आईं, साथ खड़े रहे,  फिर भी कभी-कभी दिल से हमें तंग करते रहे।  उनकी दोस्ती का ये अनोखा अंदाज़ है,  कभी प्यार से, कभी मजाक में हमें नचाते हैं।  कभी पास आते, कभी दूर हो जाते,  पर ये दोस्ती में कभी कमी नहीं लाते।  कुछ क़ामिन दोस्त हैं, पर दिल के करीब हैं,  उनके साथ बिताए लम्हे, हमेशा खास रहते हैं। -: नितिन कुमार :-

देश की मिट्टी (Desh ki Mitti) - Soil of the Nation

देश की मिट्टी (Desh ki Mitti) - Soil of the Nation पहला छंद: देश की मिट्टी, चंदन सी पावन, माथे पे लगाऊँ, बन जाऊँ मैं धावन। इसकी रक्षा में, जीवन अर्पण कर दूँ, भारत माँ की सेवा में, हर पल समर्पित रहूँ। दूसरा छंद: इस मिट्टी में जन्मे, वीर सपूत अनेक, जिनकी गाथा गाता, हर एक जन सेवक। भगत सिंह, गाँधी, नेहरू की यह धरती, त्याग और बलिदान की, अमर कहानी गढ़ती। तीसरा छंद: इस मिट्टी में खिले, रंग-बिरंगे फूल, भाईचारा, एकता का, अनुपम है मूल। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब यहाँ, मिलजुल कर रहते, जैसे एक परिवार महान। चौथा छंद: देश की मिट्टी, मेरी माँ का आँचल, इसकी रक्षा में, मैं हूँ अटल। हर कण में बसा, देशप्रेम का भाव, भारत माँ की जय, यही मेरा है ठाव।

मन उंच उंच उडे आकाशी - Man Unch Unch Ude Aakashi

मन उंच उडे आकाशी मन उंच उडे आकाशी बोट लावुनिये नभाशी मी आहे अजुनी धर्तीवर मना तू आता काहीतरी कर. बघ इथे फक्त स्वप्नांची नगरी राख होते सकाळी सगळी उजे ड  इथे इमारतीतच येतो गरीब इथे रोजच मरतो. फुलांचा इथे गंध नसतो मातीलाही इथे रंग नसतो मोलभाव होतो इथे इमानाचा खून होतो इथे नात्याचा जा कुठेतरी उडत जा जिथे असेल माणुसकी नात्या पलिकडचे नाते असेल असेल तिथे जाणीवकी -: नितिन कुमार :-